जयशंकर प्रसाद के राष्ट्रीय विचार : राय कृष्णदास
महाकवि जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भारत के अतीत की भव्यता साकार होती है. उनकी कविताओं में आगत भविष्य का अरुणोदय दिखाई देता है. उनके उपन्यासों और कहानियों में वर्तमान...
महाकवि जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भारत के अतीत की भव्यता साकार होती है. उनकी कविताओं में आगत भविष्य का अरुणोदय दिखाई देता है. उनके उपन्यासों और कहानियों में वर्तमान...
समालोचन के पन्द्रह वर्ष होने पर संपादकीय टिप्पणी और कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं.
रचनाकार समाज की साझी कल्पना को पुनर्निर्मित कर उसे एक साथ जोड़े रखते हैं. और यही बड़ी बात है. आज प्रख्यात कथाकार निर्मल वर्मा (3 अप्रैल 192 25 अक्तूबर 2005)...
भारत के स्वाधीनता संग्राम के केन्द्रीय पुरुष महात्मा गांधी के चिंतन में राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और स्वदेशी जैसी अवधारणाएँ आरंभ से ही स्पष्ट दिखाई देती हैं. संवाद के माध्यम से वे...
भौतिक संसाधनों पर कब्ज़े की होड़ ने साम्राज्यवाद को जन्म दिया. नतीजतन, अनेक देश उसकी चपेट में आकर गुलाम बने. साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना के प्रसार और लम्बे संघर्षों के बल पर...
जीविका के लिए श्रम करना केवल मनुष्य की ही नहीं, प्रत्येक प्राणी की मूल प्रवृत्ति है. भारतीय सभ्यता संभवतः एकमात्र ऐसी सभ्यता है जिसमें उत्पादक श्रम, जो किसी भी संस्कृति...
अरुणेश नीरन पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे, पर यूँ चले जायेंगे ऐसा लगता नही था. जो उनको जानते हैं. उनके जीवट को भी जानते हैं. उनकी स्मृति को नमन...
भाषाओं के विवाद कितने गम्भीर और निर्णायक होते हैं इसे भारतीय महाद्वीप से अधिक और कौन समझ सकता है? अभी हाल ही में महाराष्ट्र की एक नगर परिषद के साइन...
असमति के इस दूसरे अंक में विनोद दास, लीलाधर मंडलोई, नवल शुक्ल, सविता सिंह, पवन करण, प्रभात, केशव तिवारी, प्रभात मिलिंद, निधीश त्यागी, विनय सौरभ, बाबुषा, अपर्णा मनोज, अविनाश मिश्र,...
समालोचन ‘असहमति की सौ कविताएँ’ के अपने विशेष अंक का यह पहला हिस्सा प्रस्तुत कर रहा है. इसमें सच, साहस और सौन्दर्य है. ये सबसे पहले कविताएँ हैं. इस अंक...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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