अपने-अपने रहीम: हरीश त्रिवेदी
रहीम (17 दिसम्बर, 1556 – 1 अक्तूबर, 1627) को हिंदी पढ़ने वाले उनके नीति के दोहों के कारण जानते हैं और अपना कवि मानते हैं. विख्यात विद्वान प्रो. हरीश त्रिवेदी...
रहीम (17 दिसम्बर, 1556 – 1 अक्तूबर, 1627) को हिंदी पढ़ने वाले उनके नीति के दोहों के कारण जानते हैं और अपना कवि मानते हैं. विख्यात विद्वान प्रो. हरीश त्रिवेदी...
लगभग ६०० साल पूर्व चित्तौड़गढ़ में प्राकृत में लिखी जिनहर्षगणि के महाकाव्य रत्नशेखर नृप कथा को प्रस्तुत करते हुए पहली बात तो यही लगती है कि भारत में कथा कहने...
कवि शमशेर बहादुर सिंह की जन्म तिथि 3 जनवरी 1911 को पड़ती है, कई जगहों पर यह तिथि 13 जनवरी 1911 भी देखने को मिलती है. लेकिन हाई स्कूल के...
समकालीन प्रमुख कथाकार तरुण भटनागर के उपन्यासों- ‘लौटती नहीं जो हँसी’, ‘राजा, जंगल, और काला चाँद’ तथा ‘बेदावा’ पर आधारित सुपरिचित कवि-लेखक निशांत का यह आलेख विस्तार से इन उपन्यासों...
कथाकार और ‘तद्भव’ पत्रिका के यशस्वी संपादक अखिलेश का यह आलेख आत्म के विविध आयामों से गुजरते हुए उसकी रचनात्मक रूपांतरण की प्रविधि को समझने की कोशिश करता है. व्यक्ति...
औपनिवेशिक भारत में मजदूरों को भारत से दूर देशों में खटने के लिए ले जाया जाता था जहाँ वे अकथ शोषण और प्रताड़ना के शिकार होते थे. उन्हीं के बीच...
आज मंगलेश डबराल की पुण्यतिथि है, पिछले वर्ष आज ही के दिन वह हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गये थे. आज रघुवीर सहाय का जन्म दिन भी है. ‘रघुवीर...
वरिष्ठ कथाकार और ‘पहल’ पत्रिका के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन ने आज जीवन के पचासी वर्ष पूरे कर लिए हैं, समालोचन की तरफ से जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई. इस अवसर पर...
मन्नू भंडारी (3 अप्रैल, 1931-15 नवम्बर, 2021) को देखिये तो महादेवी वर्मा की याद आती थी, वैसी ही सादगी और गरिमा. जीवन-वृत्त और सृजित साहित्य में भी समानताएं तलाशी जा...
धर्म, जाति, समाज, परिवार और लैंगिगता के कारण पीड़ित दलित स्त्रियों की इन आत्मकथाओं से संभव है आप परिचित हों- हर आत्मकथा दर्द की जैसे कोई नदी हो- लाइफ़ ऑफ़...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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